गोवा में चल रहे शतरंज विश्व कप का माहौल इन दिनों काफी उत्साह से भरा रहा, और बुधवार को तो जश्न का अवसर भी मिला। बता दें कि महज़ 19 वर्ष के उज्बेक ग्रैंडमास्टर जवोखिमिर सिंदारोव ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए विश्व कप खिताब अपने नाम किया। मौजूद जानकारी के अनुसार वे इस प्रतियोगिता के सबसे युवा ओपन विश्व कप विजेता बने हैं। गौरतलब है कि इसी वर्ष भारत की दिव्या देशमुख भी 19 वर्ष की उम्र में महिला विश्व कप खिताब जीत चुकी हैं, जिससे यह साल युवा चैंपियंस के नाम रहा है।
सिंदारोव ने 16वीं सीड के रूप में टूर्नामेंट में प्रवेश किया था और किसी भी भविष्यवाणी में उन्हें प्रबल दावेदार नहीं माना गया था। लेकिन नॉकआउट प्रारूप में उनकी सटीक तैयारी और अवसरों को भुनाने की क्षमता ने उन्हें सीधा 2026 कैंडिडेट्स का टिकट दिला दिया है। दूसरी ओर, भारत के लिए यह विश्व कप एक अधूरी कहानी छोड़ गया, क्योंकि 23 साल बाद मेज़बानी करने के बावजूद 24 भारतीय खिलाड़ियों में से कोई भी शीर्ष तीन में नहीं पहुंच सका।
भारत के शीर्ष दावेदार डि गुकेश, अरुण एरिगैसी, विदित गुजराती, पेंटाला हरिकृष्णा और अरविंद चितांबरम सभी अपेक्षाओं के साथ उतरे थे, लेकिन निर्णायक मुकाबलों में सफेद मोहरों से खेलते हुए हुई छोटी-सी गलती भारी पड़ गई। फॉर्मेट ऐसा था कि एक खराब दिन किसी भी खिलाड़ी को बाहर का रास्ता दिखा सकता था। अनुभवी ग्रैंडमास्टर लेवोन अरोनियन पहले ही कह चुके थे कि इस नॉकआउट संरचना में शीर्ष 20 के बाहर के खिलाड़ियों के पास भी लगभग 15 % जीत की संभावना रहती है।
मौजूदा जानकारी के मुताबिक घरेलू दबाव भी भारतीय खिलाड़ियों पर साफ नजर आया। घर में खेलना जहां समर्थन देता है, वहीं अपेक्षाओं का बोझ भी साथ लाता है। कई युवा ग्रैंडमास्टरों ने स्वीकार किया कि भावनाओं को स्थिर रखना इस फॉर्मेट में सबसे बड़ी चुनौती होती है। कुछ मौकों पर यही दबाव स्थिर स्थिति को अचानक गलत मोड़ पर ले गया है।
वहीं, अनुभवी दिग्गजों का कहना है कि आजकल इंजन-आधारित तैयारी ने खिलाड़ियों की रचनात्मकता को सीमित कर दिया है। विदित गुजराती और ग्रैंडमास्टर प्रवीण ठिपसे जैसे खिलाड़ियों ने हाल ही में चिंता जताई है कि अत्यधिक इंजन-निर्भर तैयारी से खिलाड़ी यह भूल जाते हैं कि असल खेल में कब तैयारी खत्म कर अपनी समझ से आगे बढ़ना चाहिए। गौरतलब है कि इस विश्व कप में कई निर्णायक जीत उन्हीं खिलाड़ियों ने हासिल की, जिन्होंने तैयारी के साथ-साथ बोर्ड पर मौलिकता का इस्तेमाल किया।
हालांकि भारतीय चुनौती पूरी तरह निराशाजनक नहीं रही। प्रनव वी, एसएल नारायणन, और दिप्तयान घोष ने कई बड़े खिलाड़ियों को टक्कर दी। दिप्तयान ने तो इयान नेपोमिनियाची जैसे दिग्गज को शुरुआती दौर में बाहर कर सबका ध्यान खींचा। लेकिन जैसा कहा जाता है नॉकआउट फॉर्मेट स्थिरता और शांत दिमाग की कसौटी होता है, और भारत यहाँ थोड़ा पीछे रह गया।
फिर भी भारतीय शतरंज के लिए उम्मीदें बाकी हैं। बता दें कि आर प्रज्ञानानंदा FIDE सर्किट के ज़रिए अंतिम कैंडिडेट्स स्थान के बहुत क़रीब हैं। यदि सब सही रहा तो भारत अगले वर्ष कैंडिडेट्स में कम से कम एक स्थान सुरक्षित कर सकता है, हालांकि जहां संभावनाएँ कई थीं, नतीजे उतने नहीं मिल पाए हैं।
आखिरकार, यह विश्व कप भारत के लिए सीखों से भरा रहा और आने वाले सालों में भारतीय खिलाड़ी इन अनुभवों को और मजबूत प्रदर्शन में बदल सकेंगे, ऐसा विश्वास किया जा रहा है और यही भारतीय शतरंज की लगातार बढ़ती ताकत की पहचान भी हैं।

