Tuesday, June 25, 2024
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Shraddha Murder Case : कबूलनामे पर टिकी थ्योरी, पुलिस की थ्योरी’ क्या अदालत में श्रद्धा को इंसाफ़ दिला पाएगी ?

श्रद्धा वालकर हत्याकांड इन दिनों सुर्खियों में है। पुलिस का दावा है कि श्रद्धा के साथ लिव इन रिलेशन में रह रहे आफ़ताब पूनावाला ही हत्यारा है और उसने तकरीबन छह महीने पहले 18 मई को श्रद्धा की हत्या कर दी थी।

पुलिस का यह भी दावा है कि आफ़ताब ने ये भी कबूल किया है कि उसने श्रद्धा के शव को कई हिस्सों में काटा और फिर इन टुकड़ों को मेहरौली से सटे जंगल में फेंक दिया। अब पुलिस आफ़ताब को इन जंगलों में ले जाकर शव के टुकड़ों (हड्डियों) को ढूँढने में जुटी हुई है।

हत्या से जुड़े कई पहलू रोज़ सामने आ रहे हैं, लेकिन जो कुछ भी मीडिया में सामने आ रहा है, वो पुलिस सूत्रों के हवाले से दिखाया-सुनाया जा रहा है। लेकिन सवाल पूछे जा रहे हैं कि पुलिस हिरासत में आफ़ताब का कबूलनामा और इस पर आधारित ‘पुलिस की थ्योरी’ क्या अदालत में श्रद्धा को इंसाफ़ दिला पाएगी?

पुलिस को दिया कबूलनामा कितना पुख्ता सबूत?

श्रद्धा हत्याकांड में अभी तक जो भी बातें सामने आई हैं वह सारी बातें आफ़ताब पूनावाला के कथित कबूलनामे पर आधारित हैं। अगर क़ानून की बात करें तो पुलिस के सामने दिया गया बयान अदालत में स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि इस कबूलनामे की कोई अहमियत नहीं होती। अगर अपराधी कुछ कबूल करता है और उसकी निशानदेही पर वो बात प्रमाणित हो जाती है तो अदालत भी इसे स्वीकार करती है।”

“जहाँ तक श्रद्धा हत्याकांड की बात है तो पुलिस के पास परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं। ऐसे मामलों में लास्ट सीन थ्योरी को भी प्रमुखता से अदालत के सामने रखा जाता है। पुलिस को फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट (खून और हड्डियों की जाँच से) की मदद से साबित करना होगा कि श्रद्धा की हत्या हुई है।”

इस मामले में डीएनए पुष्टि और आफ़ताब के साथ श्रद्धा को आख़िरी बार देखा जाना पुलिस के लिए मज़बूत केस खड़ा करने में मददगार हो सकता है।

जिस तरह से आफ़ताब के बयान के आधार पर पुलिस ने पाया है कि 18 मई को श्रद्धा की गला घोंटकर हत्या करने के बाद उसने 300 लीटर का फ्रिज ख़रीदा, जबकि उस घर को देखते हुए इतना बड़ा फ्रिज ख़रीदने की वाजिब वजह नज़र नहीं आती। पुलिस ने इस बात का सबूत भी जुटा लिया है कि ये फ्रिज 19 मई को ख़रीदा गया।”

जैसे की आपको पता है कि श्रद्धा हत्याकांड में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है और न ही शव बरामद हुआ है, ऐसे में पुलिस के सामने हत्यारे आफताब को सज़ा दिलाना आसान नहीं होगा।

कितना मुश्किल है फॉरेंसिक सबूतों को जुटाना ?

अब तक जो बातें सामने आ रही हैं उसके मुताबिक इस हत्याकांड का न तो कोई चश्मदीद गवाह सामने आया है और न ही शव (या शरीर के हिस्सों) को ठिकाने लगाते किसी ने देखा है। तो ऐसे में सारा मामला फ़ॉरेंसिंक सबूतों पर आकर टिक जाता है।

पिछले तीन दिनों से पुलिस मेहरौली के आस-पास उन जंगलों की खाक छान रही है जहाँ कथित तौर पर आफ़ताब ने श्रद्धा के शरीर के टुकड़ों को फेंका था। पुलिस का कहना है कि अब तक 10 टुकड़े मिले हैं जो हड्डियों के रूप में हैं और श्रद्धा के शव के हो सकते हैं।

हालाँकि अधिकारी ये बखूबी जानते हैं कि फॉरेंसिक तहक़ीक़ात के बाद ही इस बात की पुष्टि हो सकेगी कि बरामद हड्डियां श्रद्धा की ही हैं। पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट भी मानते हैं कि ये आसान काम कतई नहीं है और हर कदम पर विशेषज्ञता की दरकार होगी।

श्रद्धा की हत्या मई महीने में हुई बताई जा रही है, ऐसे में छह महीने बीत जाने के बाद क्या फॉरेंसिक एक्सपर्ट के हाथ कुछ लगेगा?

आपको दिल्ली से सटे नोएडा के कुख्यात निठारी हत्याकांड याद होगा। उस मामले में भी चश्मदीद गवाह नहीं थे और अदालत में फॉरेंसिक सबूतों से तय हुआ था कि हत्याएं हुईं और गुनाहगारों को सज़ा भी मिली।

खून न्यूक्लियस फॉर्म में होता है इसलिए इस मामले में भी अगर बहुत गंभीरता से फ़ॉरेंसिक जाँच हो तो नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। इसके अलावा हड्डियां का क्षरण बहुत धीरे-धीरे होता है। और अगर हथियार बरामद हो जाता है तो इसके और हड्डियों के कट के पैटर्न से साबित हो सकता है कि इसी हथियार से हत्या हुई है।”

अगर डीएनए पुष्टि की बात करें तो श्रद्धा के पिता या भाई के खून के सैंपल से पुष्टि हो सकती है कि पुलिस को मिले शव के हिस्से (हड्डियां) श्रद्धा के ही हैं।”

नार्को टेस्ट की मंज़ूरी, इसके कानूनी पहलू

इन सब के बीच, पुलिस को आफ़ताब का नार्को टेस्ट कराने की मंज़ूरी मिल गई है। पुलिस का कहना था कि चूंकि आफ़ताब बार-बार अपने बयान बदल रहा है इसलिए सही जाँच के लिए ज़रूरी है कि आफ़ताब का नार्को टेस्ट किया जाए।

दरअसल, नार्को टेस्ट एक तरह की झूठ पकड़ने वाली तकनीक है, जिसमें संबंधित व्यक्ति को कुछ दवाएँ या इंजेक्शन दिए जाते हैं. आमतौर पर इसके लिए सोडियम पेंटोथोल का इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे वह व्यक्ति अर्धबेहोशी की हालत में चला जाता है.

ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति में वह सवालों का सही-सही जवाब देता है क्योंकि अर्धबेहोशी की वजह से वह व्यक्ति दिमाग़ का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं कर पाता और जान-बूझ कर झूठ गढ़ पाने की स्थिति में नहीं होता। यह तकनीक वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित भले ही है लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि यह शत-प्रतिशत नहीं होते।

जहाँ तक नार्को टेस्ट के क़ानूनी पहलू का सवाल है, तो यह विवेचना का हिस्सा तो हो सकता है, लेकिन अदालत में इसे सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। 22 मई, 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था कि

“अभियुक्त या फिर संबंधित व्यक्ति की सहमति से ही उसका नार्को एनालिसिस टेस्ट हो सकता है। किसी की इच्छा के ख़िलाफ़ न तो नार्को टेस्ट, न ही ब्रेन मैपिंग और न ही पॉलीग्राफ़ टेस्ट किया जा सकता है”



सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को इस तरह की प्रक्रिया से गुज़ारना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दख़लअंदाज़ी होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना था कि पॉलीग्राफ़ या नार्को जाँच के दौरान जाँच एजेंसियों को मानवाधिकार आयोग के दिशा निर्देशों का सख़्ती से पालन करना होगा।

क्या है श्रद्धा हत्याकांड का पूरा मामला

मुंबई की एक मल्टिनैशनल कंपनी में काम करने वाली 26 साल की श्रद्धा वाकर की मुलाकात आफताब से एक डेटिंग ऐप के जरिए हुई। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। श्रद्धा मुंबई में अपनी मां के साथ रहती थी और उनके पिता अलग रहते थे। 2019 में श्रद्धा ने अपनी मां को आफ़ताब के बारे में बताया और साथ रहने की इच्छा जताई थी। लेकिन मां ने अलग मज़हब होने की वजह से इनकार कर दिया। श्रद्धा ने नाराज़ होकर घर छोड़ दिया और आफ़ताब के साथ लिव-इन में रहने लगी। परिवार ने काफी समझाया, लेकिन श्रद्धा नहीं मानी और कुछ वक़्त बाद दोनों ने मुंबई छोड़ दी।

दोनों दिल्ली महरौली के छतरपुर इलाक़े में रहने लगे। एफ़आईआर के मुताबिक़, कुछ दिनों बाद ही श्रद्धा ने अपनी मां को बताया कि आफ़ताब उनके साथ मारपीट करता है। कुछ समय बाद श्रद्धा की मां का निधन हो गया। तब श्रद्धा ने पिता को फ़ोन करके इस बारे में बात की और उनसे मिलकर भी आफ़ताब के बारे में बताया। दो महीने तक श्रद्धा से संपर्क न होने पर उनकी दोस्त ने इसकी जानकारी श्रद्धा के भाई को दी।

जिसके बाद पिता ने मुंबई में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। मुंबई पुलिस की जांच में श्रद्धा की आख़िरी लोकेशन दिल्ली के मेहरौली इलाके में मिली। मामला दिल्ली पुलिस के पास पहुंचा और जांच में शक़ की सूई आफ़ताब तक पहुंची।

पुलिस का कहना है कि पूछताछ में आफ़ताब ने श्रद्धा की हत्या और शव के टुकड़े करके जंगल में फेंकने की बात क़बूल की है। पुलिस जांच में पता चला है कि आफ़ताब और श्रद्धा के बीच अक्सर शादी की बात पर झगड़ा होता था और 18 मई को आफ़ताब ने गुस्से में आकर श्रद्धा की हत्या की और शव के टुकड़े छुपाने के लिए एक बड़े साइज़ का नया फ़्रिज भी ख़रीदा।

आफ़ताब की निशानदेही पर पुलिस श्रद्धा के शव के टुकड़ों की खोज कर रही है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक़, आफ़ताब ने श्रद्धा की हत्या के बाद उसके शरीर से कई टुकड़े किए और जंगल में अलग-अलग जगह फेंक दिए ताकि वो पकड़ा न जाए।

पुलिस ने बताया कि श्रद्धा की हत्या करने के बाद भी आफ़ताब जून तक उसका इंस्टाग्राम अकाउंट इस्तेमाल करता रहा ताकि लोगों को लगे कि श्रद्धा ज़िंदा है।

हालांकि अब तक पुलिस को वो हथियार नहीं मिल सका है जिसका इस्तेमाल आफ़ताब ने श्रद्धा के शव के टुकड़े करने के लिए किया था।

आफ़ताब ने गूगल पर सर्च किया कि फर्श पर पड़े खून के धब्बों को कैसे साफ़ किया जाए। आफ़ताब पुलिसकर्मियों से ज़्यादातर अंग्रेज़ी में बात कर रहा है। आफ़ताब ने श्रद्धा की हत्या के बाद उसके कपड़े कूड़े की गाड़ी में फेंक दिए थे।

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