Sunday, June 16, 2024
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तटीय जलकृषि प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक, 2023, भारतीय संसद के दोनों सदनों से पारित

तटीय जलकृषि प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक, 2023, भारतीय संसद के दोनों सदनों से आज पारित हो गया है । भारत सरकार इस बात पर बल देना चाहती है कि तटीय जलकृषि और उससे जुड़ी गतिविधियाँ सीआरजेड अधिसूचनाओं के तहत सीआरजेड के भीतर अनुमत गतिविधियाँ हैं । संशोधन विधेयक में प्रावधान है कि तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम के तहत दिया गया पंजीकरण मान्य होगा और इसे सीआरजेड अधिसूचना के तहत वैध अनुमति के रूप में माना जाएगा, जिससे लाखों छोटे सीमांत जलकृषि किसानों को कई एजेंसियों से सीआरजेड मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी ।

इस संशोधन के माध्यम से सीएए अधिनियम के तहत तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) के नो डेवलपमेंट जोन (एनडीजेड) [एचटीएल से 200 मीटर] के भीतर हैचरी, ब्रूड स्टॉक मल्टीप्लिकेशन सेंटर (बीएमसी) और न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर (एनबीसी) जैसी जलकृषि इकाइयों की स्थापना के लिए विशिष्ट छूट दी गई है ।

मूल अधिनियम में पंजीकरण के बिना तटीय जलकृषि करने पर 3 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है। यह पूरी तरह से नागरिक प्रकृति के अपराध के लिए बहुत कठोर सजा प्रतीत होती है और इसलिए संशोधन विधेयक में प्रावधान किया गया है कि नागरिक अपराधों के गैर-अपराधिकरण करने के सिद्धांत के अनुसार इस अपराध के लिए जुर्माने जैसी उपयुक्त नागरिक अनुकूल प्रणाली अपनाई जाएगी ।

संशोधन विधेयक इस अधिनियम के दायरे में तटीय जलकृषि की सभी गतिविधियों को व्यापक रूप से कवर करने के लिए व्यापक आधार वाली “तटीय जलकृषि” का प्रावधान करता है और फॉर्म और तटीय जलकृषि के अन्य कार्यक्षेत्रों के बीच मूल अधिनियम में मौजूद अस्पष्टता को दूर करता है। इससे यह सुनिश्चित होने की संभावना है कि कोई भी तटीय जलकृषि गतिविधि अधिनियम के दायरे से बाहर न रहे और पर्यावरणीय को नुकसान पहुंचाए बिना संचालित हो ।

2005 में, तटीय जलकृषि गतिविधि मूलतः श्रिम्प फार्मिंग थी। अब पर्यावरण के अनुकूल तटीय जलकृषि के नए रूप जैसे केज कल्चर, सी वीड कल्चर, बाई-वाल कल्चर, मरीन ऑर्नेमेंटल फिश कल्चर, पर्ल ऑयस्टर कल्चर आदि सामने आए हैं जो तटीय क्षेत्रों में और ज्यादातर सीआरजेड के भीतर किए जा सकते हैं । इन गतिविधियों में भारी राजस्व उत्पन्न करने और तटीय मछुआरे समुदायों, विशेष रूप से मछुआरा महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने की भी क्षमता है और इसलिए इसे बढ़ावा देने की आवश्यकता है और यह इन गतिविधियों को तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम के दायरे में लाकर किया जा सकता है।

सरकार का उद्देश्य तटीय जलकृषि प्राधिकरण की कुछ परिचालन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाकर तटीय जलकृषि में व्यापार करने में आसानी को बढ़ावा देना है। वर्तमान संशोधन स्वामित्व बदलने पर या गतिविधि के आकार में परिवर्तन के मामले में पंजीकरण प्रमाणपत्र में परिवर्तन करने और प्रमाणपत्र के विरूपण, क्षति या हानि आदि के मामले में नया प्रमाणपत्र प्रदान करने का प्रावधान करता है । इसमें चक्रवृद्धि शुल्क (कमपाऊँडेड फ़ी) के साथ पंजीकरण के नवीनीकरण (रिनीवल) के लिए आवेदन करने में विलंब को माफ करने का भी प्रावधान करता है जो मूल अधिनियम में नहीं था।

सीएए के सदस्य सचिव की शक्तियां और अध्यक्ष की अनुपस्थिति में प्राधिकरण के सामान्य कामकाज जैसे कई प्रशासनिक मामले जो अस्पष्ट थे, उन्हें प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही के लिए संशोधित अधिनियम के तहत उपयुक्त रूप से समाधान किया गया है।

संशोधन स्पष्ट रूप से प्राधिकरण को समितियों को नियुक्त करने का अधिकार देता है जिसमें अधिनियम के तहत कर्तव्यों के कुशल निर्वहन और कार्यों के निष्पादन के लिए विशेषज्ञ, हितधारक और सार्वजनिक प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।

रोग की रोकथाम तटीय जलकृषि की सफलता की कुंजी है। इसलिए, सरकार ऐसी सुविधाएं बनाने का उद्देश्य रखती है जो तटीय जलकृषि में उपयोग के लिए आनुवंशिक रूप से बेहतर और रोग-मुक्त स्टॉक का उत्पादन करें। ऐसी सुविधाएं, अर्थात् हैचरी, ब्रूड स्टॉक मल्टीप्लिकेशन सेंटर और न्यूक्लियस ब्रिडिंग सेंटर केवल समुद्री जल तक सीधी पहुंच वाले क्षेत्रों में स्थापित किए जा सकते हैं और सरकार उन्हें सक्षम और सुविधाजनक बनाने का उद्देश्य रखती है। इसके साथ ही, सरकार अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान बनाकर तटीय जलकृषि में एंटीबायोटिक और फार्माकोलॉजिकल सक्रिय पदार्थों के उपयोग को रोकने का भी उद्देश्य रखती है।

सरकार वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों (ग्लोबल बेस्ट प्रेकटीसेस) जैसे जलकृषि क्षेत्रों की मैपिंग और ज़ोनेशन, उत्तम जलकृषि प्रथाओं, गुणवत्ता आश्वासन और सुरक्षित जलकृषि उत्पादों को लाने और अधिनियम में उपयुक्त प्रावधान पेश करके पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांतों को कमजोर किए बिना व्यापार करने में आसानी की सुविधा प्रदान करने की परिकल्पना करती है। इनसे तटीय जलकृषि क्षेत्र में उत्पादन और उत्पादकता, ट्रेसेबिलीटी, मूल्य श्रृंखला और निर्यात के साथ प्रतिस्पर्धात्मकता और उद्यमशीलता को स्थायी तरीके से बढ़ावा मिलेगा और तट के साथ लगे ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार में निरंतर वृद्धि होगी।

संशोधन विधेयक में तटीय पर्यावरण अनुपालन के लिए तटीय जलकृषि से जुड़ी गतिविधियों को बेहतर ढंग से विनियमित करने के लिए तटीय जलकृषि प्राधिकरण को सशक्त बनाने के लिए नए प्रावधान किए गए हैं। संशोधन विधेयक तटीय जलकृषि इकाइयों से अपशिष्टों (एफ़्लुएंट्स) के उत्सर्जन या निर्वहन (एमिशन ऑर डिस्चार्ज) के लिए मानकों को तय करने या अपनाने का प्रावधान करता है, जिसमें मालिक का उत्तरदायित्व होगा कि डेमोलिशन की लागत या पर्यावरण को नुकसान की लागत, यदि कोई हो, उसका भुगतान करे, जैसा कि प्राधिकरण द्वारा मूल्यांकित किया गया हो और जो प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (पोल्लुटर पेस प्रिंसिपल) की भावनाओं के अनुरूप है, साथ ही विधेयक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों या भू-आकृति (जियो-मोर्फोलोजिकल) संबंधी विशेषताओं वाले क्षेत्रों में तटीय जलकृषि को प्रतिबंधित करती है।

प्रौद्योगिकी और कल्चर पद्धतियों में सुधार के साथ, श्रिम्प कल्चर के प्रदूषणकारी पहलू में काफी गिरावट आई है । तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम 2005 में इन संशोधनों के माध्यम से प्रदान की गई नीतियों से अब यह क्षेत्र प्रजातियों के विविधीकरण और क्षेत्र के विस्तार के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है।

पृष्ठभूमि:

तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम 2005 तटीय पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से तथा इस अधिनियम के अनुरूप तटीय क्षेत्रों में तटीय जल कृषि खेती के व्यवस्थित विकास को बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया था । अधिनियम के प्रावधानों के तहत तटीय जलकृषि प्राधिकरण द्वारा निर्धारित प्रणालियों और प्रक्रियाओं के कारण तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना तटीय जलकृषि का तीव्र और टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल विकास संभव हुआ है। अधिनियम के प्रावधानों ने प्राधिकरण द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन तटीय नियामक क्षेत्र (सीआरजेड) क्षेत्र के भीतर तटीय जलकृषि के निरंतर संचालन को भी सुनिश्चित किया है ।

इसके परिणामस्वरूप लाखों नौकरियों का सृजन, स्व-रोज़गार के अवसर, जलीय किसानों की आय में वृद्धि, एक जीवंत जलकृषि सपोर्ट इंडस्ट्री के विकास के साथ-साथ जलकृषि में व्यवसायों और उद्यमिता के विकास को बढ़ावा मिला है । परिणामस्वरूप, आज, तटीय जलकृषि सरकार की जीवंत नीति सहायता के आधार पर 2-4 हेक्टेयर भूमि वाले विविध और मेहनती छोटे किसानों और शिक्षित युवाओं द्वारा हासिल की गई प्रमुख सफलता की कहानियों में से एक है ।

पिछले 9 वर्षों के दौरान, देश का श्रिम्प उत्पादन 2013-14 के 3.22 लाख टन से 267% बढ़कर 2022-23 में रिकॉर्ड 11.84 लाख टन (अनंतिम आंकड़े) हो गया है । भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 2013-14 में 30,213 करोड़ रुपये से दोगुना होकर 2022-23 में 63,969 करोड़ रुपये हो गया, जिसमें श्रिम्प ने निर्यात में सबसे अधिक हिस्सेदारी यानी 43,135 करोड़ रुपये का योगदान दिया । 123% की वृद्धि के साथ श्रिम्प निर्यात दोगुना से अधिक हो गया है, जो 2013-14 में 19,368 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 43,135 करोड़ रुपये हो गया है, जिसमें यूएसए सबसे बड़ा आयातक है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु राज्यों ने तटीय जलकृषि श्रिम्प उत्पादन और निर्यात की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

यद्यपि मूल अधिनियम ने विशेष रूप से तटीय जलकृषि को सीआरजेड अधिसूचना के दायरे से बाहर रखा है, लेकिन इसके विपरीत अस्पष्टताएं और व्याख्याएं हैं क्योंकि अदालत में कानूनी संस्थाओं और अदालतों द्वारा सीआरजेड अधिसूचना 1991 को संदर्भित किया गया था । इसके अलावा, मूल अधिनियम की धारा 13(8) जो तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) के “नो डेवलपमेंट जोन” में तटीय जलकृषि को प्रतिबंधित करती है, उसे हैचरी पर भी लागू होने की गलत व्याख्या की गई है ।

इसलिए, जल कृषि किसान और हितधारक इस कानून को प्रगतिशील बनाने और नियामक बोझ को कम करने, अस्पष्टताओं को दूर करने और तटीय जलकृषि प्राधिकरण अधिनियम के कुछ प्रावधानों में संशोधन करने का अनुरोध करते रहे हैं ।

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