Saturday, August 30, 2025
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कुछ गलतफहमियां, कभी हालात ने नहीं दिया साथ, कैसे कमजोर पड़ा ट्रंप-मोदी का ‘ब्रोमांस’?

अमेरिका की फाइनेंशियल कंपनी जेफ्रीज ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। जिसमें भारत पर लगाए गए टैरिफ को लेकर कुछ बातें सामने आई हैं। या यूं कह लीजिए कि कंपनी ने दो बड़े दावे किए हैं। रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका ने जो भारत पर 50% का टैरिफ लगाया है, उसमें राजनीतिक और आर्थिक दोनों पहलू शामिल हैं। रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाकर अपनी व्यक्तिगत नाराजगी जताई है। व्यक्तिगत नाराजगी को हमारी और आपकी भाषा में निजी खुन्नस भी कहा जाता है। लेकिन इस खुन्नस की वजह मई महीने में भारत पाक के बीच हुए संघर्ष को शांत कराने का क्रेडिट ट्रंप खुद को देते हैं। लेकिन भारत ने उनके इस प्लान को अपने इनकार के साथ चौपट कर दिया। उल्टा इस मसले पर भारत ने कई बार तीसरे पक्ष की दखलअंदाजी से इनकार किया है। लेकिन ट्रंप हैं कि मानते नहीं और वो खुद को कई बार नोबेल पीस प्राइज का दावेदार बता चुके हैं। ऐसे में भारत का ये रुख इसके आड़े आता है। रिपोर्ट में ट्रंप के निजी खुन्नस को टैरिफ लगाने की बड़ी वजहों में से एक बताई गई है। 

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रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका के जितने भी ट्रेडिंग पार्टनर हैं, मतलब जितने भी देश उसके साथ व्यापार करते हैं उनमें भारत ऐसा देश है जिसपर सबसे ज्यादा टैरिफ लगाया गया है। इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों को भी झटका लगा है। भारत को कभी अमेरिका का ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ कहा जाता था और दोनों देशों के बीच 20 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियारों की खरीद हो चुकी है। लेकिन अब ट्रंप के तीखे बयान और नीतियां इस रिश्ते पर सवाल उठा रही हैं। भारत और अमेरिका के रिश्तों में आई गिरावट बीते कुछ सालों में गठित कुछ घटनाक्रम के बाद निकलकर आए हैं, जिसमें कुछ गलतफहमियां और कुछ हालात और कुछ कुछ ट्रंप की हठधर्मिता का नतीजा हैं। 

कश्मीर पर बिन बुलाए बाराती बनने की कोशिश 

पुरानी कहावत है कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना। ये कहावत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर बिल्कुल सटीक बैठती है। जहां दो देशों के बीच पहले से ही जंग जैसी स्थिति हो वहां एक तीसरा शख्स बिन बुलाए बराती बनकर कूद रहा है और वो भी कोई छोटा मोटा मेहमान बनकर नहीं बल्कि सीधा दूल्हा बनकर। ट्रंप 1.0 के वक्त 22 जुलाई 2019 को ट्रंप ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात की थी। उस वक्त ट्रंप ने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान राजी हो जाते हैं तो वो कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं। ट्रंप ने उस वक्त ये दावा किया था कि पीएम मोदी उनसे इस मामले में भूमिका निभाने को कहा है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह कश्मीर के मामले में किसी की मध्यस्थता नहीं चाहता। ये बात तो पूरी दुनिया जानती है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। कश्मीर भारत के सिर का ताज है। कश्मीर पर भारत का रुख भी साफ है कि वो जब भी पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर हासिल करेगा तो अपने दम पर ही हासिल करेगा। लेकिन इसके बाद भी बात ज्यादा नहीं बिगड़ी, क्योंकि कोविड लॉकडाउन से कुछ दिनों पहले ही भारत में ‘नमस्ते ट्रंप’ रैली हुई, जो बेहद शानदार रही। 

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वो मुलाकात जो हो न सकी

सितंबर 2024 में हुई जब मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा और राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा आयोजित क्वाड शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका का दौरा कर रहे थे। भारतीय वार्ताकारों ने दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव प्रचार कर रहे ट्रंप से मुलाकात की व्यवस्था करने के लिए संपर्क किया। साथ ही उनकी प्रतिद्वंद्वी कमला हैरिस से भी संपर्क किया। ट्रंप भारतीय प्रधानमंत्री से मिलने के लिए तुरंत तैयार हो गए और मिशिगन में एक चुनावी कार्यक्रम में यह घोषणा भी कर दी कि वह मोदी से मिलेंगे, लेकिन हैरिस के अभियान ने इससे इनकार कर दिया। भारतीय पक्ष ट्रंप से मुलाकात से पीछे हट गया क्योंकि वह केवल एक उम्मीदवार से मिलना नहीं चाहता था। यह बात ट्रंप को रास नहीं आई, क्योंकि उन्होंने पहले ही मोदी से मुलाकात की घोषणा कर दी थी। 

नोबेल से वंचित हो गए ट्रंप

भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव के चौथे दिन हुई। ट्रंप को पक्का यकीन है कि उन्होंने ही संघर्ष खत्म कराया। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि टकराव के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत नहीं हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति के दिमाग में यह बात है कि उन्होंने अपने डिप्टी जेडी वेंस से फोन कराया था। ट्रंप कह रहे हैं कि उन्होंने पाकिस्तानी नेतृत्व से बात की और चेताया कि लड़ना बंद नहीं किया तो ट्रेड डील नहीं होगी। वैसे अमेरिकी राष्ट्रपति यह नहीं बता रहे कि पाकिस्तान में उन्होंने किससे बात की। वहीं, भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने संघर्षविराम की पहल की थी, जिसे उसने स्वीकार कर लिया। ट्रंप मानते हैं कि यह संघर्ष परमाणु युद्ध तक जा सकता था। इसमें अपनी भूमिका नकारे जाने से वह खफा हैं। इस बात में तो कोई संदेह ही नहीं है कि ट्रंप शांति का नोबेल पुरस्कार पाना चाहते हैं।

ट्रंप ने फंसाने के लिए जाल फेंका 

पीएम मोदी के कनाडा आने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका भाग लिए। ट्रंप जानते थे कि जी7 बैठक के दौरान अगर वो पीएम मोदी से मिलते हैं तो वहां मौजूद दुनियाभर की मीडिया उनसे सवाल करती कि पाकिस्तान में सीजफायर किसने करवाया था। अगर ऐसा होता तो पीएम मोदी ट्रंप और दुनिया के सामने बोल देते की सीजफायर भारत ने करवाया है और न ही अमेरिका ने। पीएम मोदी ट्रंप का फैक्ट चेक कर देते। इसलिए डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका भागना ही उचित समझा और वहां जाकर पीएम मोदी से कहा कि आप यहीं मुझसे मिलने आ जाइए। ट्रंप ने पीएम मोदी को फोन मिलाकर न्यौता इसलिए दिया क्योंकि उनके दिमाग में खतरनाक प्लान चल रहा था। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप ने मोदी को अमेरिका बुलाने का वही वक्त चुना जिस वक्त पाकिस्तान के फेल्ड मार्शल आसिम मुनीर भी मौजूद हैं। एक्सपर्ट्स की माने तो ट्रंप आसिम मुनीर के कंधे पर बंदूक रखकर एक बार फिर भारत पर निशाना लगाना चाहते थे। ट्रंप ने चाल चली और ठीक उसी वक्त पीएम मोदी को अमेरिका बुलाया जिस वक्त पाकिस्तान का आर्मी चीफ वहां बैठा था। । भारत को आशंका थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति अचानक मोदी और मुनीर का आमना-सामना करा सकते हैं। तब भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत अंजाम पर पहुंचने वाली थी। अमेरिकी अधिकारियों ने भी कहा कि डील बस हो ही गई है। लेकिन, ट्रंप को लगा कि उनकी बार-बार उपेक्षा हो रही है। उन्होंने रूस से तेल खरीद का बहाना बनाया और डील रोक दी।

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कॉल का कोई जवाब नहीं दिया

ट्रंप 2.0 के दौरान विदेशी नेताओं ने तारीफों और उपहारों के ज़रिए उनके अहंकार को तृप्त करके सफलता पाई है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री किंग चार्ल्स का एक पत्र लेकर व्हाइट हाउस पहुँचे। फ़िनलैंड के राष्ट्रपति ने गोल्फ़ कोर्स पर श्री ट्रम्प के साथ अच्छा समय बिताया। यहाँ तक कि सार्वजनिक रूप से फटकार खाने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की व्हाइट हाउस पहुँचे और कैमरों के सामने ट्रंप का शुक्रिया अदा किया। लेकिन ट्रम्प, मोदी से जो सबसे ज़्यादा चाहते हैं, वो उन्हें मिल न सका।  अगर मोदी को एक कमज़ोर देश के साथ युद्धविराम के अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए देखा गया, तो घरेलू स्तर पर इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। मोदी की मज़बूत छवि काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वे पाकिस्तान के प्रति कितने सख़्त हैं। यह स्वीकार करना कि ट्रम्प की इसमें भूमिका थी, उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित करना तो दूर की बात है, आत्मसमर्पण के समान माना जाएगा। पाकिस्तान तो ट्रंप की चरणवंदना में वैसे भी लगा है। उसके द्वारा ट्रंप को नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित करने का फ़ैसला जल्दबाज़ी में लिया गया।  न्यूयॉर्क टाइमस की रिपोर्ट के अनुसार टैरिफ वार्ता से निराश ट्रम्प ने कई बार श्री मोदी से संपर्क किया, जैसा कि चर्चाओं से अवगत दो लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया। मोदी ने उन अनुरोधों का जवाब नहीं दिया। 
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