संपादकीय । अभिषेक सिंह : गाजियाबाद में भारतीय जनता पार्टी के नए जिला और महानगर कार्यालय के लिए मधुबन-बापूधाम में करीब 1,200 वर्गमीटर जमीन की लगभग 6 करोड़ रुपये में रजिस्ट्री होने की खबर सामने आई है। प्रस्तावित कार्यालय पांच मंजिला होगा और इसके निर्माण पर भी करोड़ों रुपये खर्च होने की संभावना है।

एक राजनीतिक संगठन अपने कार्यालय के लिए जमीन खरीदे और भवन बनाए—यह अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है। सवाल कार्यालय बनने का नहीं है। सवाल उस शहर की प्राथमिकताओं का है, जहां एक तरफ करोड़ों रुपये के कार्यालय की नींव रखी जा रही है और दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों की बुनियादी हालत तक सुधारने के लिए वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है।
कुछ दिन पहले हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में हमने शालीमार गार्डन स्थित एक सरकारी स्कूल की तस्वीर सामने रखी थी। यह वही स्कूल है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी। लेकिन आज, लगभग दो दशक बाद, वहां की तस्वीर किसी मजबूत सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कहानी नहीं बल्कि व्यवस्था की अनदेखी का सवाल खड़ा करती है।

स्कूल की बाउंड्रीवाल तक नहीं है। कई कमरे जर्जर और टूटे हुए हैं। शौचालयों की हालत बद से बदतर है, स्कूल की बाउंड्रीवाल ना होने के कारण नशेड़ियों ने स्कूल के शौचालयों को अपना अड्डा बना लिया है। जहाँ तहँ नशे के इंजेक्शन और दवाई की खली शीशी देखि जा सकती हैं। जो मासूम बच्चों के लिए भविष्य में बड़ा खतरा बन सकता है। बच्चों के लिए पीने के पानी के लिए बनाई गई टंकी पूरी तरहां से क्षतिग्रस्त है। रसोई है लेकिन मिड-डे मील स्कूल परिसर में तैयार होने के बजाय बाहर से बनकर आता है। चारो तरफ गन्दगी फैली है, एक एक कक्षा में 2-3 कक्षाओं के बच्चें एक साथ पड़ने को मजबूर हैं।
सोचिए—जिस जगह पर बच्चों को देश का भविष्य बनने के लिए पढ़ना चाहिए, वहां उन्हें बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो हम किस विकास की बात कर रहे हैं?
यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है जिसमें हम बड़ी-बड़ी इमारतों, उद्घाटनों और राजनीतिक कार्यालयों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल की टूटी दीवार, खराब शौचालय और बच्चों के पीने के पानी जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

और यहां एक तथ्य राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2009 में जब इस विद्यालय की शिक्षा समिति बनी थी, उसके सदस्यों में संजीव शर्मा का नाम भी शामिल था, जो आज गाजियाबाद शहर से भाजपा के विधायक हैं। यह तथ्य किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल पूछने के लिए सामने रखा जाना चाहिए—जिस व्यवस्था से जुड़े लोग आज सत्ता और जिम्मेदारी के महत्वपूर्ण पदों पर हैं, क्या उनके सामने ऐसे सरकारी स्कूलों की स्थिति भी उतनी ही प्राथमिकता रखती है जितनी राजनीतिक संगठन के लिए एक नया कार्यालय?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भाजपा के कार्यालय का निर्माण पार्टी का संगठनात्मक विषय है और उसके लिए खर्च किया जाने वाला पैसा पार्टी का अपना संसाधन हो सकता है। इसलिए दोनों खर्चों की कानूनी या वित्तीय तुलना सीधे-सीधे करना उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना बिल्कुल उचित है।
अगर एक राजनीतिक संगठन करोड़ों रुपये की जमीन खरीदकर पांच मंजिला कार्यालय बनाने की क्षमता रखता है, तो उसी शहर में सरकारी स्कूलों के लिए जिम्मेदार सरकारी तंत्र के पास बच्चों को सुरक्षित कमरे, साफ शौचालय, पीने का पानी और बाउंड्रीवाल उपलब्ध कराने की इच्छाशक्ति और गति क्यों नहीं दिखाई देती?
राजनीति में अक्सर शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य को सबसे ऊपर रखने की बातें होती हैं। चुनावों के दौरान सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के वादे भी किए जाते हैं। लेकिन असली परीक्षा भाषणों में नहीं, स्कूल की दीवारों, बच्चों के शौचालयों और उनके पीने के पानी के नल में होती है।
एक तरफ पांच मंजिला राजनीतिक कार्यालय खड़ा होगा। दूसरी तरफ उसी शहर का सरकारी स्कूल अपने टूटे कमरों और बदहाल शौचालयों के साथ खड़ा रहेगा। यही विरोधाभास इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
यह वही साहिबाबाद विधानसभा क्षेत्र है, जहां से भाजपा के सुनील कुमार शर्मा लगातार बड़ी जीत दर्ज करते रहे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में शर्मा ने 2,14,835 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज कर इतिहास बनाया था और अपना नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में शामिल कराया था। उस समय यह स्वतंत्रता के बाद भारत के किसी विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा जीत का अंतर बताया गया था। आज सुनील कुमार शर्मा सिर्फ विधायक ही नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री भी हैं।

रिकॉर्ड बड़ी उपलब्धि है। जनता का इतना बड़ा समर्थन निश्चित रूप से राजनीतिक ताकत का प्रमाण है। लेकिन लोकतंत्र में एक सवाल इससे भी बड़ा है— क्या बड़े-बड़े चुनावी रिकॉर्ड अपने आप किसी क्षेत्र का विकास कर देते हैं? क्या लाखों वोटों से जीतने के बाद उस क्षेत्र के हर सरकारी स्कूल की तस्वीर भी बदल जाती है? क्या बच्चों को साफ पानी मिल जाता है? क्या जर्जर स्कूलों की छतें अपने आप ठीक हो जाती हैं? क्या टूटे शौचालय इस्तेमाल के लायक हो जाते हैं? अगर जवाब नहीं है, तो फिर हमें विकास को मापने का पैमाना बदलना होगा।
गाजियाबाद के जनप्रतिनिधियों, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को यह बताना चाहिए कि शालीमार गार्डन के इस सरकारी स्कूल की जर्जर स्थिति कब तक सुधरेगी? बाउंड्रीवाल कब बनेगी? टूटे कमरों की मरम्मत कब होगी? बच्चों के लिए साफ पानी और बेहतर शौचालय कब उपलब्ध होंगे? और मिड-डे मील की व्यवस्था को लेकर क्या स्थायी समाधान किया गया है?
क्योंकि किसी भी शहर की असली तस्वीर वहां की सत्ताधारी पार्टी के चमकदार कार्यालयों से नहीं, उसके सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति से दिखाई देती है।
अगर हम एक पांच मंजिला इमारत खड़ी करने में करोड़ों रुपये खर्च कर सकते हैं, तो क्या हम अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित कमरा, एक साफ शौचालय और एक गिलास साफ पानी सुनिश्चित नहीं कर सकते?
यह सवाल किसी एक पार्टी से ज्यादा पूरी व्यवस्था से है। और इस सवाल का जवाब भाषण नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव होना चाहिए।


