गाजियाबाद: जहाँ एक ओर सरकारें ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण और स्वच्छता का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं गाजियाबाद के वार्ड 73 (बी ब्लॉक, चंद्रशेखर पार्क) के दूरदर्शी कर्णधारों ने विकास का एक ऐसा अनूठा मॉडल पेश किया है, जिसे देखकर सब हैरान हैं।
जिस प्रकार मुगल-ए-आज़म फिल्म में बादशाह अकबर ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अनारकली को दीवारों के पीछे चुनवा दिया था, ताकि उसकी सल्तनत की जग-हँसाई ना हो। ठीक उसी तर्ज पर, गाजियाबाद के शालीमार गार्डन के वार्ड 73 के पार्षद महोदय और बी ब्लॉक आरडब्ल्यूए (RWA) ने अपनी प्रशासनिक विफलता, नाकामियों और कुछ खास रसूखदार दुकानदारों के व्यापारिक हितों को बचाने के लिए चंद्रशेखर पार्क के सार्वजनिक शौचालय को हमेशा के लिए दीवारों में चुनवाकर बंद कर दिया है।

इस मास्टरस्ट्रोक के पीछे के कारणों की परतें उधेड़ेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे:
- सफाई से परहेज : शौचालय बनेगा तो इस्तेमाल होगा, इस्तेमाल होगा तो गंदा भी होगा और दुर्गंध भी आएगी। लेकिन पार्षद और आरडब्ल्यूए ने नियमित साफ-सफाई की जिम्मेदारी उठाने के बजाय दीवार खड़ी करना ज्यादा आसान समझा। यानी समस्या ही खत्म!
- कुछ विशेष दुकानदारों के प्रति समर्पण: स्थानीय लोगों का कहना है कि शौचालय की तरफ कुछ रसूखदार दुकानदारों की दुकानें हैं और इस सार्वजनिक शौचालय की वजह से उनकी दुकानों की शोभा धूमिल हो रही थी। भला उन विशेष लोगों के आगे आम जनता की सुविधा की क्या औकात?
- नाकामियों पर पर्दा: शौचालय की खस्ताहाल हालत देखकर कहीं जनता को आरडब्ल्यूए और पार्षद की नाकाबिलियत का अहसास न हो जाए, इसलिए जड़ से ही ढांचा बंद करवा दिया गया।
जनता की परेशानी और दोहरा मापदंड
यह सार्वजनिक शौचालय पार्क में आने वाले बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के साथ-साथ पार्क के चारों तरफ दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों और वहाँ आने वाले ग्राहकों की बुनियादी जरूरत था। लेकिन अब वे सब दर-दर भटकने और खुले में शौच करने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा विरोधाभास: जिस आरडब्ल्यूए और पार्षद को इस शौचालय से आने वाली दुर्गंध से तकलीफ थी, उन्हें उन रसूखदार दुकानदारों द्वारा सार्वजनिक जगहों और फुटपाथ पर कब्जा जमाकर रखे गए जनरेटर सेट नजर नहीं आते।
दुकानदारों द्वारा किए गए अतिक्रमण से जनता की आवाजाही में जो भारी परेशानी होती है और ट्रैफिक जाम लगता है, उस पर इन जिम्मेदार नुमाइंदों की आँखें हमेशा के लिए बंद हैं।
सीधी जिम्मेदारी का सवाल: जवाब दीजिए पार्षद जी और RWA!
क्या पब्लिक प्रॉपर्टी किसी कि बपौती है?
जनता ने आपको अपनी समस्याएं सुलझाने के लिए चुना था, न कि समस्याओं को ईंट-सीमेंट के नीचे दफना देने के लिए। यदि शौचालय गंदा हो रहा था, तो उसकी नियमित सफाई करवाना आपकी जिम्मेदारी थी, न कि उस पर दीवार खड़ी करके जनता को अपमानित करना।
सार्वजनिक शौचालय केवल एक बुनियादी जरूरत नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की नींव हैं। ये खुले में शौच की कुप्रथा को रोककर गंभीर बीमारियों से जनस्वास्थ्य की रक्षा करते हैं और शहरों को स्वच्छ रखते हैं। इसके साथ ही, यह महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, राहगीरों और दुकानदारों-कामगारों को सुरक्षित, निजी और गरिमापूर्ण सुविधा प्रदान कर उनके दैनिक जीवन को सुगम बनाते हैं।
सार्वजनिक सुविधाओं को इस तरह अपनी सहूलियत या कुछ खास लोगों को फायदा पहुँचाने के लिए बंद कर देना साफ तौर पर जनता के अधिकारों का हनन है।


