Sunday, August 31, 2025
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Vanakkam Poorvottar: Syeda Hameed ने पहले बांग्लादेशियों का समर्थन किया फिर Assam को राक्षसों की धरती बता दिया

असम में बांग्लादेशी घुसपैठ और नागरिकता का प्रश्न दशकों से सबसे बड़ा सामाजिक–राजनीतिक मुद्दा रहा है। हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व योजना आयोग की सदस्य सैयदा हमीद ने बयान दिया कि “बांग्लादेशी भी इंसान हैं, वे यहाँ रह सकते हैं।” इस बयान ने पुराने घाव को एक बार फिर कुरेद दिया है। हम आपको बता दें कि उनके वक्तव्य ने न केवल राज्य में राजनीतिक भूचाल ला दिया बल्कि असम की सांस्कृतिक पहचान, जनसंख्या संतुलन और ऐतिहासिक संघर्षों को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सैयदा हमीद पर सीधा हमला बोला और उनके बयान को “जिन्ना के सपने को साकार करने की कोशिश” बताया। सरमा का कहना था कि इस प्रकार की सोच असम की अस्मिता और जनसंख्या संरचना के लिए सीधा खतरा है। उन्होंने लाचित बरफुकन के संघर्ष की याद दिलाते हुए कहा कि असम अपनी भूमि और संस्कृति की रक्षा के लिए हर कीमत पर तैयार है। वहीं असम जातीय परिषद (AJP) और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने भी सैयदा हमीद की टिप्पणी को अस्वीकार्य करार दिया और असम आंदोलन के दौरान दिए गए बलिदानों की ओर इशारा किया। उनके अनुसार, यह बयान राज्य की ऐतिहासिक संवेदनाओं की उपेक्षा है।

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दूसरी ओर, कांग्रेस नेता देबरत सैकिया ने इस विवाद को केंद्र और राज्य सरकारों की नीतिगत विफलता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री ने 2014 में किए वादे के अनुसार बांग्लादेशियों को वापस भेजने की ठोस कार्रवाई की होती, तो आज असम इस संकट का सामना नहीं कर रहा होता। इसी बीच, आयोजन समिति असम नागरिक सम्मेलन (ANS) ने स्पष्ट किया कि सैयदा हमीद के विचार व्यक्तिगत थे और संगठन “असम समझौते की पवित्रता” में विश्वास रखता है। उन्होंने 25 मार्च 1971 के बाद आए सभी बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान और निर्वासन की माँग दोहराई।
असम समझौते की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर गौर करें तो सामने आता है कि राज्य में बांग्लादेशी प्रवास का मुद्दा 1971 के युद्ध और उसके बाद की स्थिति से गहराई से जुड़ा है। हम आपको याद दिला दें कि असम आंदोलन (1979–1985) इसी मुद्दे पर उभरा और अंततः 1985 के असम समझौते में परिणत हुआ। समझौते ने 24 मार्च 1971 की तिथि को नागरिकता की अंतिम सीमा माना था। लेकिन इसका क्रियान्वयन अधूरा रहा, जिसके कारण आज भी विवाद जीवित है। हम आपको बता दें कि जनसांख्यिकीय बदलाव, भूमि पर अतिक्रमण और सांस्कृतिक पहचान के क्षरण की आशंका असमिया समाज को निरंतर बेचैन रखती है।
देखा जाये तो सैयदा हमीद का तर्क मानवीय दृष्टिकोण से प्रेरित प्रतीत होता है कि हर इंसान को जीने का अधिकार है। लेकिन असम के संदर्भ में यह विचार संवेदनशील ऐतिहासिक स्मृतियों से टकराता है। हम आपको बता दें कि असमिया समाज ने दशकों तक अपने अस्तित्व और पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। इसके साथ ही लाखों शरणार्थियों और अवैध प्रवासियों के आगमन ने जनसंख्या संतुलन को प्रभावित किया है। यही कारण है कि “बांग्लादेशियों को यहाँ रहने देना” जैसे बयान को स्थानीय जनता अपने अस्तित्व पर चोट के रूप में देखती है।
हम आपको यह भी बता दें कि सैयदा हमीद ने एक और विवादित बयान देते हुए असम को राक्षसों की धरती बताया है और कहा है कि यहां पर मुसलमानों पर जुल्म हो रहे हैं। सैयदा हमीद ने कहा कि पहले असम में ‘मियां’ को अच्छे अर्थ में कहते थे लेकिन अब ‘मियां’ एक गाली की तरह है। सैयदा हमीद ने कहा, “असम कभी ऐसा नहीं था। असम एक फ्रेंकस्टीन की तरह, एक राक्षस की तरह बन गया है। यह एक खतरनाक जगह बन गई है। मैं बस इतना कह सकती हूं कि मुसलमानों के खिलाफ प्रतिशोध है। वे ‘मियां’ को अच्छे अर्थ में कहते थे लेकिन अब ‘मियां’ एक गाली की तरह है।” हम आपको बता दें कि सैयदा हमीद ने हाल ही में एक प्रतिनिधिमंडल के साथ असम का दौरा किया था। इस प्रतिनिधिमंडल में हर्ष मंदर, वजाहत हबीबुल्ला, फैयाज शाहीन, प्रशांत भूषण और जवाहर सरकार शामिल थे। इन लोगों ने राज्य सरकार द्वारा खाली गए कराए गए मुस्लिम इलाकों का दौरा किया। इसी दौरान सैयदा हमीद ने मीडिया से बातचीत करते हुए बांग्लादेशियों का खुल कर पक्ष लेते हुए पूछा, “बांग्लादेशी होना क्या गलत है? बांग्लादेशी भी तो इंसान हैं। अल्लाह ने इतनी बड़ी धरती बनाई है। बांग्लादेशी भी यहां रह सकते हैं। बांग्लादेशी किसी का अधिकार नहीं छीन रहे हैं। सरकार कह रही है कि वह दूसरों का अधिकार छीन रहे हैं। यह मानवता के लिए हानिकारक है। अल्लाह ने धरती लोगों के लिए बनाई है, शैतानों के लिए नहीं। अगर कोई इंसान कहीं रह रहा है तो उसे बेरहमी से क्यों निकाला जाए।”
बहरहाल, यह पूरा विवाद दिखाता है कि असम में बांग्लादेशी प्रवास का मुद्दा महज़ नागरिकता या विस्थापन का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह अस्मिता, सुरक्षा और राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न है। एक ओर मानवाधिकार और मानवीय संवेदनाएँ हैं। दूसरी ओर ऐतिहासिक समझौते, जनसंख्या संतुलन और क्षेत्रीय पहचान की रक्षा का संकल्प है। स्पष्ट है कि इस विषय पर की गई किसी भी टिप्पणी को केवल भावनात्मक या मानवतावादी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि असम के राजनीतिक-सांस्कृतिक यथार्थ के साथ जोड़कर समझना होगा।
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