भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत की तस्वीरों ने हरेक हिंदुस्तानी को प्रफुल्लत कर दिया। किस तरह से चीन ने रेड कॉर्पेट पर हमारे देश के प्रधानमंत्री का स्वागत भव्य स्वागत किया। लेकिन चीन पहुंचते ही पीएम मोदी का सबसे बड़ा बयान सामने आ गया है और ये बयान अमेरिका की नींद उड़ाने वाला है। दरअसल, पीएम मोदी जापान की यात्रा समाप्त करके टोक्यो से सीधे चीन के तियानजिन शहर पहुंचे और वहां पर उनका ग्रैंड वेलकम हुआ और इसी से गदगद पीएम मोदी ने अपना पहला बयान एक्स पर जारी कर दिया। उन्होंने कहा कि चीन के तियानजिन पहुंच गया हूं। एससीओ शिखर सम्मेलन में विचार विमर्श और अलग अलग विश्व नेताओं से मुलाकात के लिए इच्छुक हूं। यानी कि पीएम मोदी व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग व अलग अलग देशों के नेताओं से मुलाकात करेंगे।
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अब ये बयान दिखाता है कि भारत के प्रधानमंत्री ने पहले ही पहुंचते ही दुनिया को ये संकेत दिया और बता दिया कि वो चीन की धरती पर कदम रख चुके हैं। ये बयान कहीं न कहीं अमेरिका के लिए बड़ा सिर दर्द होगा। अमेरिका लगातार भारत के साथ बातचीत करने के लिए उत्सुक है। खुद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पीएम मोदी से बात करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति बेताब हैं। कई जर्मन अखबारों ने तो यहां तक कहा कि पीएम मोदी ने ट्रंप का फोन तक नहीं रिसीव किया। इन सब की बड़ी वजह अमेरिका का भारत पर मनमाना टैरिफ ठोकना है। अमेरिका को ये अच्छे से पता था कि भारत के प्रधानमंत्री विश्व के सबसे बड़े लीडरों में से एक हैं। वो भारत के पीएम की छवि को धूमिल करने की कोशिश करते रहे। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप को इसका अंदाजा नहीं था कि भारत 1990 वाला भारत नहीं रहा। भारत 2025 वाला भारत है।
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अगर भारत को आंख दिखाओगे तो भारत भी उसी अंदाज में आपको जवाब देगा। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकदम ट्रंप को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात वर्षों में अपनी पहली यात्रा पर चीन पहुंचे हैं। यह यात्रा उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ऐसे समय में देखने को मिलेगी जब भारत और वाशिंगटन के बीच संबंध खराब हो रहे हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा शिखर सम्मेलन के लिए मोदी की तियानजिन यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने रूसी तेल खरीदना बंद करने से इनकार करने के कारण भारतीय निर्यात पर शुल्क दोगुना करके 50% कर दिया था।
इस विवाद ने भारत और अमेरिका के बीच वर्षों से चले आ रहे गहरे सहयोग को, जो तकनीक और बीजिंग की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने के साझा दृढ़ संकल्प पर आधारित था, उलट दिया है। इसने भारत को अपने व्यापार में विविधता लाने के लिए आक्रामक रूप से अन्यत्र देखने के लिए भी मजबूर किया है।