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Tuesday, August 4, 2026
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Iran को Real-Time Intelligence Support दे रहा Russia ! China ने भी Tehran की मदद के लिए बढ़ाये हाथ, अमेरिका की चिंता बढ़ी

पश्चिम एशिया में चल रहा अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब केवल दो देशों की जंग नहीं रह गया है। यह संघर्ष धीरे धीरे एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय शक्ति संघर्ष का रूप लेता दिख रहा है। हाल में सामने आई खुफिया जानकारी ने संकेत दिया है कि कई बड़े देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। हम आपको बता दें कि एक अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आशंका है कि चीन ईरान को आर्थिक मदद देने, मिसाइल से जुड़े पुर्जे उपलब्ध कराने और अन्य सैन्य सामग्री देने पर विचार कर रहा है। बताया जा रहा है कि यह जानकारी तीन ऐसे सूत्रों के हवाले से सामने आई है जो इस मामले से परिचित बताए जा रहे हैं।
इसी के साथ यह भी सामने आया है कि रूस कथित तौर पर ईरान को पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, युद्धपोतों और विमानों की वास्तविक समय की जानकारी दे रहा है। इस तरह की खुफिया जानकारी से ईरान को अमेरिकी बलों को निशाना बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन इस संघर्ष में खुलकर उतरने से बच रहा है। एक सूत्र के अनुसार चीन अधिक सावधानी बरत रहा है क्योंकि यह युद्ध उसकी ऊर्जा आपूर्ति के लिए खतरा बन सकता है और वह चाहता है कि यह संघर्ष जल्द समाप्त हो।

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हालांकि दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि ईरान के साथ चल रहे युद्ध में रूस और चीन वास्तव में कोई बड़ा कारक नहीं हैं। इसके बावजूद खुफिया रिपोर्टों ने वाशिंगटन में चिंता जरूर बढ़ा दी है। हालांकि अब तक अमेरिका ने इस पर सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है। उधर रूस ने सार्वजनिक रूप से इस संघर्ष को एकतरफा सशस्त्र आक्रमण बताते हुए इसे तुरंत समाप्त करने की मांग की है।
हम आपको बता दें कि विश्लेषकों का मानना है कि रूस और चीन दोनों ही देश अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति के तहत ईरान के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहे हैं। चीन लंबे समय से ईरान का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है और उसने ऊर्जा, आधारभूत ढांचे और निवेश के क्षेत्र में तेहरान को आर्थिक सहारा दिया है। रूस और ईरान का सैन्य सहयोग भी नया नहीं है। सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान दोनों देशों ने मिलकर वहां की सरकार का समर्थन किया था और खुफिया साझेदारी भी की थी।
हम आपको बता दें कि रूस और चीन के अलावा उत्तर कोरिया को भी लंबे समय से ईरान का रणनीतिक सहयोगी माना जाता है। इतिहास बताता है कि ईरान इराक युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया ने तेहरान को हथियार और मिसाइल तकनीक उपलब्ध कराई थी। कई विश्लेषकों के अनुसार उत्तर कोरिया, वेनेजुएला और कुछ अन्य देश भी राजनीतिक स्तर पर ईरान के साथ खड़े माने जाते हैं। इन्हें अक्सर उस ढीले ढाले समूह का हिस्सा बताया जाता है जिसे अमेरिकी प्रभाव के विरोध में खड़ी धुरी के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा पाकिस्तान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की और ओमान जैसे कई देशों ने भी अमेरिका और उसके सहयोगियों की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की है और कूटनीतिक समाधान की मांग की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध के दौरान भी रूस को ईरान, चीन और उत्तर कोरिया से विभिन्न प्रकार की सामग्री और रणनीतिक मदद मिली थी, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगियों ने यूक्रेन को हथियार और खुफिया सहायता दी थी। इस वजह से दुनिया में दो अलग अलग शक्ति समूह उभरते दिखाई दे रहे हैं। हम आपको यह भी बता दें कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान भी काफी बड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इस अभियान में पचास हजार से अधिक सैनिक, दो सौ से ज्यादा लड़ाकू विमान और दो विमानवाहक पोत शामिल हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह युद्ध कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी अधिकारियों ने इसकी समय सीमा के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है।
हम आपको बता दें कि विश्लेषकों का मानना है कि अगर रूस, चीन या उत्तर कोरिया जैसे देश किसी भी रूप में खुलकर ईरान के साथ खड़े हो जाते हैं तो यह संघर्ष और व्यापक हो सकता है। इससे न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा और ऊर्जा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। इस तरह ईरान के साथ खड़े देशों की संभावित भूमिका ने इस युद्ध को एक साधारण क्षेत्रीय संघर्ष से उठाकर वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा बना दिया है। बहरहाल, आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि यह टकराव कूटनीति से सुलझता है या दुनिया को एक और लंबे भू-राजनीतिक संघर्ष की ओर धकेल देता है।
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