back to top
Tuesday, July 28, 2026
Homeअंतरराष्ट्रीयPOJK में Pakistan ने बर्बरता की सारी हदें लांघीं, प्रदर्शनकारियों को गोलियों...

POJK में Pakistan ने बर्बरता की सारी हदें लांघीं, प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भूना, जनता का विरोध और भड़का

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) एक बार फिर खून से लाल है। रावलाकोट से सामने आ रहे वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के दावे ऐसे सवाल खड़े कर रहे हैं, जिन्हें दुनिया अब अनदेखा नहीं कर सकती। यह अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि मानवाधिकारों पर गंभीर हमला है। हम आपको बता दें कि पीओजेके में पिछले 52 दिनों से संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में व्यापक जनआंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें हैं कि गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाए, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं और जनता की अन्य लोकतांत्रिक मांगों को स्वीकार किया जाए। वार्ता के कई दौर हुए, लेकिन जब सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी तो हजारों लोग रावलाकोट से मुजफ्फराबाद की ओर ‘अवामी हकूक लॉन्ग मार्च’ लेकर निकल पड़े।
इसी दौरान रावलाकोट में जो कुछ हुआ, उसने पूरे घटनाक्रम को और भयावह बना दिया। आंदोलन से जुड़े प्रत्यक्षदर्शियों और जेएएसी के नेताओं का दावा है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, जिसमें कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई और लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए। मृतकों में आंदोलन के संस्थापक उमर नजीर कश्मीरी के छोटे भाई उस्मान नजीर का नाम भी शामिल बताया गया है। विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की भी बात कही गई है, जबकि दो बलोच कार्यकर्ताओं के भी इस गोलीबारी में जान गंवाने का दावा किया गया है। हालांकि इन आरोपों पर पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

इसे भी पढ़ें: पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में तेज किया उग्रवाद-रोधी अभियान, मस्तुंग में अब तक 140 चरमपंथी ढेर

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना देते हैं। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारी सफेद झंडे लेकर शांतिपूर्ण मार्च कर रहे थे और बार-बार सुरक्षा बलों से पीछे हटने की अपील कर रहे थे। उनका दावा है कि प्रदर्शनकारियों का पाकिस्तान की जनता या सेना से कोई बैर नहीं है, बल्कि वह केवल अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके बावजूद गोलियां चलीं और सड़कों पर खून बहा। आंदोलनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि पूरे क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गईं, ताकि घटनाओं की जानकारी बाहरी दुनिया तक न पहुंच सके। विदेशों में रहने वाले कश्मीरियों से संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के समक्ष आवाज उठाने तथा पाकिस्तानी दूतावासों के बाहर प्रदर्शन करने की अपील भी की गई है।
साथ ही स्थिति केवल मानवाधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पीओजेके की राजनीतिक व्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। मीरपुर डिवीजन की 13 विधानसभा सीटों पर मतदान के बीच कई स्थानों से हिंसा और चुनावी धांधली के आरोप सामने आए हैं। लंबे आंदोलन और हड़ताल के कारण राजनीतिक दलों का चुनाव प्रचार लगभग ठप पड़ गया है। आम जनता की चुनावों में रुचि भी बेहद कम दिखाई दे रही है। हालात इतने बिगड़ गए कि सुधनोती और रावलाकोट के दो जिलों में विधानसभा चुनाव 10 अगस्त तक स्थगित करने पड़े। यह तस्वीर बताती है कि पीओजेके में केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी गंभीर संकट में है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पीओजेके में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण, राजनीतिक विरोधियों पर कार्रवाई, संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई जैसे आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और नैतिक प्रश्न खड़ा होता है। क्या उसे पीओजेके के लोगों के साथ हो रहे अत्याचारों पर केवल कूटनीतिक बयान तक सीमित रहना चाहिए, या फिर सीधे दखल देना चाहिए? हालांकि यदि भारत ऐसा करता है तो एक खतरा यह है कि पाकिस्तान इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा सकता है। सीमा पर सैन्य गतिविधियां तेज हो सकती हैं, कूटनीतिक संबंध और अधिक खराब हो सकते हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इसलिए किसी भी कदम को सैन्य हस्तक्षेप की बजाय मानवीय, कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में उठाना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी होगा।
बहरहाल, आज सबसे बड़ा सवाल केवल पाकिस्तान से नहीं, बल्कि उन वैश्विक ताकतों से भी है जो स्वयं को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार बताती हैं। संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी और दुनिया के प्रभावशाली देशों की खामोशी कई सवाल खड़े करती है। क्या मानवाधिकार केवल चुनिंदा देशों के लिए ही मायने रखते हैं? और यदि नहीं, तो फिर संयुक्त राष्ट्र तथा अमेरिका जैसे देशों की आवाज आखिर कहां है?
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Most Popular