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Tuesday, August 4, 2026
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Vishwakhabram: Nepal Elections में देखने को मिल रही है कड़ी टक्कर, फिर से गठबंधन सरकार बनने के आसार

नेपाल अगले महीने 5 मार्च को राष्ट्रीय चुनाव कराने जा रहा है। यह चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब छह महीने पहले युवा नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। सितंबर में भड़के इन प्रदर्शनों में 77 लोगों की मौत हुई और दो हजार से अधिक लोग घायल हुए थे। दो दिनों तक चली हिंसा में सैकड़ों इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया था। अब देश एक नए राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है।
30 मिलियन आबादी वाले इस हिमालयी राष्ट्र में करीब 19 मिलियन मतदाता 275 सदस्यीय संसद के लिए वोट डालेंगे। पिछले वर्ष के प्रदर्शनों के बाद करीब दस लाख नए मतदाता सूची में जोड़े गए हैं, जिनमें अधिकतर युवा हैं। हम आपको बता दें कि 165 सीटों पर सीधे चुनाव होंगे, जहां सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी होगा, जबकि शेष सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से भरी जाएंगी। चुनाव आयोग के अनुसार 65 राजनीतिक दल मैदान में हैं, जिससे स्पष्ट है कि मुकाबला बहुकोणीय और जटिल होगा।
विश्लेषकों के अनुसार, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा है। इसके साथ ही रोजगार सृजन भी बड़ा प्रश्न है। देश की करीब एक पांचवीं आबादी गरीबी में जीवन यापन कर रही है और युवा बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है। युवा उम्मीदवार आर्थिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा कर रहे हैं। दूसरी ओर अनुभवी नेता स्थिरता और सुरक्षा को प्राथमिकता बता रहे हैं। यही टकराव इस चुनाव की दिशा तय करेगा।
प्रमुख दावेदारों की टक्कर की बात करें तो आपको बता दें कि झापा 5 निर्वाचन क्षेत्र इस बार राष्ट्रीय ध्यान का केंद्र बना हुआ है। यहां पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली एक बार फिर मैदान में हैं। चार बार प्रधानमंत्री रह चुके 74 वर्षीय ओली के सामने चुनौती कठिन है, क्योंकि युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उन्हीं के कार्यकाल में उभरे असंतोष के कारण सड़कों पर उतरा था। उनके सामने 35 वर्षीय रैपर से नेता बने बालेंद्र शाह हैं, जिन्होंने काठमांडू महानगर के मेयर पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया है। वह अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बालेंद्र शाह ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि उनका लक्ष्य ओली को उनके ही गढ़ में पराजित करना और जेन जेड आंदोलन के एजेंडे को संस्थागत रूप देना है।

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अन्य दावेदारों में नेपाली कांग्रेस के गगन थापा और तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके पुष्प कमल दहल भी शामिल हैं। लंबे समय तक माओवादी पृष्ठभूमि वाले नेताओं का वर्चस्व रहने के बाद यह चुनाव नए और पुराने नेतृत्व के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जा रहा है।
हम आपको यह भी बता दें कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत पाना कठिन होगा। ऐसी स्थिति में गठबंधन राजनीति फिर निर्णायक होगी। माना जा रहा है कि सरकार का चरित्र इस बात पर निर्भर करेगा कि गठबंधन में कौन-सा दल प्रमुख भूमिका निभाता है। इससे नीतिगत प्राथमिकताओं और विदेश नीति की शैली पर भी असर पड़ेगा।
देखा जाये तो नेपाल की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण आयाम भारत और चीन के बीच संतुलन है। नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भारत है, जो कुल आयात का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा रखता है। चीन का हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत है, परंतु बुनियादी ढांचा और बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं के माध्यम से बीजिंग की उपस्थिति वहां बढ़ी है। विश्व बैंक के अनुसार चीन ने नेपाल को 130 मिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज भी दिया है।
वहीं भारत के साथ नेपाल की खुली सीमा, सांस्कृतिक निकटता और ऊर्जा सहयोग गहरे हैं। जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पादित बिजली भारत को निर्यात की जाती है। दूसरी ओर चीन तिब्बत के माध्यम से सड़क और रेल संपर्क बढ़ाने में निवेश कर रहा है। ऐसे में नई सरकार को कूटनीतिक संतुलन साधना होगा।
देखा जाये तो नेपाल की राजनीतिक दिशा दक्षिण एशिया की सामरिक संरचना को प्रभावित कर सकती है। हिमालयी क्षेत्र में अवसंरचना निर्माण, सीमा पार ऊर्जा नेटवर्क और व्यापार गलियारों का विस्तार भारत और चीन दोनों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। यदि नई सरकार पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया को सख्ती से लागू करती है, तो मेगा परियोजनाओं में बाहरी प्रभाव सीमित हो सकता है। वहीं यदि गठबंधन अस्थिर रहा तो बाहरी शक्तियां प्रभाव विस्तार का प्रयास कर सकती हैं। इसके अलावा, चूंकि नेपाल का आंतरिक स्थायित्व भारत की उत्तरी सुरक्षा और चीन की दक्षिणी पहुंच दोनों से जुड़ा है। इसलिए यह चुनाव केवल घरेलू सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का भी संकेतक होगा।
बहरहाल, नेपाल का यह चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के पुनर्निर्माण का अवसर है। युवा मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है, परंतु अपेक्षाओं का दबाव भी उतना ही बड़ा है। नेपाल के मतदाता अब परिवर्तन के साथ स्थिरता भी चाहते हैं। आने वाला जनादेश बताएगा कि देश किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
-नीरज कुमार दुबे
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