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Tuesday, August 4, 2026
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आनंदमठ उपन्यास ने देशवासियों में राष्ट्रभाव पुष्ट किया

अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा शुक्रवार को प्रवासी भवन, नई दिल्ली में बंकिमचंद्र चटर्जी कृत आनंदमठ उपन्यास पर गोष्ठी आयोजित की गई। इस गोष्ठी की अध्यक्षता इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने की। संचालन दक्षिणी विभाग अध्यक्ष सारिका कालरा एवं धन्यवाद ज्ञापन अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय मंत्री संजीव सिन्हा ने किया। 
गोष्ठी में अपने विचार रखते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अ.भा. संगठन मंत्री मनोज कुमार ने कहा कि आनंदमठ ने भारत माता के सगुण साकार रूप को प्रतिष्ठित किया और भारत माता की जय का उद्घोष किया। इस उपन्यास में अच्छा नागरिक बनने को परम कर्तव्य बताया गया है। इस कृति में प्रकृति, शृंगार एवं सौंदर्य का गहरा वर्णन किया गया है।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने कहा कि आनंदमठ एक प्रतिष्ठित साहित्यिक कृति है। इस पर खूब विचार-विमर्श हुए हैं लेकिन और चिंतन की आवश्यकता है। इसमें वाल्मीकी रामायण से प्रेरणा लेकर जन्मभूमि की रक्षा को पवित्र कर्तव्य बताया गया है। इस उपन्यास में बंकिमचंद्र चटर्जी ने राष्ट्रभाव को प्रमुख रखा है। 
इस गोष्ठी में राकेश कुमार, वरुण कुमार, प्रिया वरुण कुमार, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुनीता बुग्गा, बबीता किरण, मंजुल शर्मा, वेद प्रकाश मिश्र, मनोज शर्मा एवं ममता वालिया ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ एक ऐतिहासिक साहित्यिक कृति है। 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित यह कृति राष्ट्र को देवी और मां के रूप में प्रतिष्ठित करती है। आनंदमठ भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। इस उपन्यास में संगृहीत गीत वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बना। उपन्यास के पात्र यानी संतान अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए पारिवारिक सुख और संपत्ति का त्याग कर राष्ट्र सेवा को ही परम धर्म मानते हैं। 
इस अवसर पर अ.भा. संयुक्त महामंत्री नीलम राठी, साहित्य परिक्रमा पत्रिका प्रबंधक रजनी मान, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के संयुक्त महामंत्री बृजेश गर्ग सहित कई साहित्यकार, शोधार्थी एवं पाठक उपस्थित रहे।
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